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दोहरा भेदभाव झेलती दलित महिलाएँ

बांसवाडा के बडवास गाव में लीला देवी पंचर लगाकर पूरे परिवार का पोषण करती ह
भारत में अनेक महिलाएँ आज भी बराबरी के हक से वंचित हैं. फिर दोहरे भेदभाव के झेलती दलित महिलाओ की हालत तो और भी बदतर है. लेकिन अब वे संगठित हो रही हैं.
                                                                                     
शास्त्र और विधि-विधान उन्हें देवी का दर्जा देते हैं पर असल जीवन का यथार्थ यह नहीं है.

दलित महिलाओ के बीच काम करने वाली जयपुर की अनीता वर्मा दुख के साथ कहती हैं, "दलित औरतों और तथाकथित ऊँची जाति की महिलाओं में बहुत फ़र्क है. आज अन्य जातियों की महिलाओ में एक आत्मविश्वास दिखता है लेकिन दलित महिलाएँ अहसासे कमतरी का शिकार होती हैं."

अनीता कहती हैं कि रिवाज़ और समाज का रुख़ अनेक दलित महिलाओं का मनोबल तोड़ कर रख देता है.

सवाई माधोपुर की पूनम वर्मा वो लम्हा नहीं भूल सकतीं जब वो शादी के बाद अपने ससुराल इटावा खातोली पहुँची और तथाकथित ऊँची जात वालों के कुँए से पानी का मटका भर लिया.
पूनम का मटका फोड़ दिया गया. उन्हें पहली बार लगा तरल पानी को भी उंच नीच की दीवार से बांटा जा सकता है. वे कहती हैं, "मेरा मटका फोड़ा गया तो मुझे बड़ा झटका लगा. पहली बार यह एहसास हुआ कि भारत में दलित होने के मायने क्या हैं. तब से मैं इन विषयों पर जन-जागरण में जुट गई."

धर्म शास्त्र कहते हैं कि मृत्यु के बाद देह मिटटी में मिल जाती है. मगर राजसमन्द की राम जाव्दिया मानती हैं कि सामाजिक भेदभाव तो दलित का शमशान तक पीछा करते हैं.
 वे बताती हैं, "हमारे राजसमन्द ज़िले में स्वर्ण जाति के शमशान पक्के बने होते हैं, उनकी छत्त पक्की होती है. हमारे शमशान खुले होते हैं. लेकिन जब बारिश नहीं होती तो उसके लिए भी दलित को दोषी ठहराया जाता है और एक टोटके के अनुसार हमारे शमशान पर हल चला दिया जाता है."
बाड़मेर की सरिता मौर्य कहती हैं कि थोडा परिवर्तन तो आया है. वे कहती हैं, "अम्बेडकर के नारे ने हमें बहुत शक्ति दी है पर दलित पंचों-सरपंचों को अब भी कठपुतली समझा जाता है."


 http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2011/03/110308_dalit_women_as.shtml 

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